मुसाहर टोले में विजित
15 मार्च 2012
सिंडी बर्मन, वरिष्ठ सामाजिक विकास सलाहकार, ब्रिटेन एड, डी.एफ.आई.डी., द्वारा बिहार में पैक्स के अंतर्गत शामिल मुसाहर समुदाय के टोले का दौरा।
सुश्री बर्मन समुदाय के सदस्यों को आश्वासन दिया कि वे उनकी कहानियों, साक्ष्यों और उनके द्वारा देखी गई स्थिति को वे उनके सहयोगियों और भारत एवं यू.के. में अन्य लोगों तक ले जाएंगी और उन्होंने मुसाहरों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर काम करने की जरूरत पर बल दिया।
सुश्री सिंडी बर्मन ने मुजफ्फरपुर विकास मंडल (एम.वी.एम.) और पैक्स के प्रतिनिधियों के साथ मुजफ्फरपुर जिले के बाघखल गांव गैगहाट ब्लॉक के एक मुसाहर टोले का दौरा किया। पैक्स से समर्थन के साथ, एम.वी.एम. ने इस क्षेत्र में काम शुरू कर दिया है। इस यात्रा के दौरान, सुश्री बर्मन ने मुसाहर समुदाय से लगभग 50 सदस्यों के साथ बातचीत की जिन्होंने सरकारी लाभ पर पहुँच और अपने समुदाय के लिए विकास की पहल की कमी के मुद्दों पर बात की। लगभग 4000 लोगों की आबादी के साथ टोले में, कोई भी बिजली का कनेक्शन या सड़कों पर सही तरीके से पहुँच नहीं है। समुदाय के सदस्यों ने विस्तार से बताया है कि उन्हें अपनी निवास भूमि पर कानूनी पात्रता नहीं है और वे निरंतर इस डर के साथ रहते हैं कि किसी भी समय उन्हें अपने घरों से बेदखल किया जा रहा सकता है।
महिलाओं ने चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात की, जहाँ नजदीक के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र गांव से 14 किलोमीटर की दूरी पर है, और ए.एन.एम. (सरकार द्वारा नियुक्त स्वास्थ्य कार्यकर्ता) हर महीने एक बार दौरा करती है। टोले में में प्राथमिक स्कूल (1 से 5वीं कक्षा तक) में कमरा कक्षा के रूप में काम करता है जिसमें न उचित दरवाजे, खिड़कियां, ब्लैक बोड और अन्य कोई सुविधाएं हैं। इस टोले के लिए आंगनवाड़ी केन्द्र भी स्कूल की इमारत में दूसरे छोटे से कमरे में रखा गया है और जो अपने दिखावट, रखरखाव, या सुविधाओं से तीन वर्ष की आयु से ऊपर के बच्चों के लिए एक केंद्र के जैसा नहीं लगता।
समुदाय के सदस्यों ने बताया कि आखिरी बार उनमें से किसी को मनरेगा के तहत काम 2008 में मिला था और वह सिर्फ 20 दिनों के लिए था। इस अधिनियम में हर ग्रामीण परिवार को मांग पर 100 दिनों का काम या एवज में बेरोजगारी भत्ता का भुगतान करने के लिए प्रावधान है। मनरेगा के माध्यम से काम की मांग की अवधारणा अब भी उनके लिए अनजानी है क्योंकि उनके जॉब कार्ड और पासबुक गांव के मुखिया (प्रधान) के पास हैं। जिन पास ये थे उन्होने कहा कि उन्हें कभी कोई पैसे नहीं मिले, हालाँकि उनकी पासबुक और जाॅब कार्ड दिखाते हैं कि पहले 4000 रुपये उन्होंने निकाले हैं।
सुश्री बर्मन ने समुदाय के साथ बातचीत और उन्हें बताया कि यात्रा वास्तव ने उनके जीवन और मुसाहर समुदाय द्वारा झेले जाने वाले भेदभाव के साथ साथ सामाजिक रूप से बहिष्कृत समूहों को जिस बहिष्कार और वंचन के मुद्दों का सामना करना पड़ता है उसकी गहरी समझ मिनी है। उन्होंने कहा कि यह वास्तव में दुख की बात है कि इतनी सारी स्पष्ट अनियमितताओं के साथ भी, समाज में सामाजिक पहचान के आधार पर मौजूद सत्ता की संरचनाओं की वजह से किसी ने आवाज नहीं उठाई।
यात्रा के बाद सुश्री बर्मन, पैक्स टीम और मुजफ्फरपुर विकास मंडल के स्टाफ के सदस्यों के बीच चर्चा हुई जहाँ उन्होंने सबसे अधिक बहिष्कृतों के साम काम करने के अपने अनुभवों, चुनौतियों और कई वर्षों से उनके संघर्ष की यात्रा की बात की।
मुसाहर समुदाय के बारे में
मुसाहर समुदाय भारत में सबसे उपेक्षित समुदायों में से एक है और वे गरीबों में सबसे गरीब लोग हैं। मुसाहर समुदाय अनुसूचित जाति (एस.सी.) की श्रेणी के अंतर्गत आता है और बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तर मध्य प्रदेश के राज्यों में पाए जाते हैं। बिहार में, मुसाहरों की अनुमानित लगभग चार लाख व्यक्तियों की आबादी है।
मुसाहरों को कुछ लोगों द्वारा ‘अछूत’ माना जाता है जिन्हें जाति पदानुक्रम में कम या कोई अधिकार प्राप्त नहीं हैं। वे संपत्ति पर स्वामित्व, आजीविका के साधन और एक शिक्षा से वंचित हैं। अपने जीवन के लिए, वे कृषि क्षेत्र में मजदूरों के रूप में या अन्य रूप में शारीरिक श्रम का काम करते हैं। ऐसे काम के लिए कम मजदूरी दी जाती है या वस्तु के रूप, ज्यादातर खराब भोजन या अनाज के रूप में पारिश्रमिक का भुगतान किया जाता है। जातिगत भेदभाव के परिणामस्वरूप शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं, और सरकार के अन्य सामाजिक विकास कार्यक्रमों पर उनकी पहुँच नहीं है।


